सदगति (sadgati) मुंशी प्रेमचन्द:-
इस कहानी का नाम है सदगति!
एक दुखी जात का चमार था! वो अपनी बेटी की शादी करवाना चाहता था! तो सहिद-शगुन विचारने के लिए उसे पंडित जी के यहां जाना था! लेकिन वहां खाली हाथ तो जा नहीं सकता था! क्योंकि पंडित जी का लक्षण उसे मालूम था पंडित जी खाली हाथों से देखते तो उसे द्वार पर से ही दुत्कार कर भगा देते! परंतु उस दुखी के पास पंडित जी को कुछ देने के लिए था ही नहीं!
इसलिए उसने सोचा, कि पंडित जी की गाय के लिए कुछ घास लेकर चला जाऊं! इसलिए सुबह से वहां घास काटने में लगा था! घास काटने के बाद वहां जल्दी पंडित जी के यहां जाना चाहता था! ये सोचकर,के पंडित जी कहीं निकल ना जाए! ताकि उसका कार्य जल्दी हो इसलिए उसने सुबह का नाश्ता भी नहीं किया था!
उसने सोचा,कि वहां से आऊंगा तब नाश्ता कर लूंगा और अपनी पत्नी को पंडित जी के आने के बाद जो कुछ सामग्री की जरूरत पड़ती है! वह उसे तैयार रखने के लिए बोल दिया था!
पंडित जी का नाम घासीराम था!
घासीराम जब दुखी को अपने द्वार आते देख, उससे कारण पूछते हैं! दुखी अपने आने का कारण बताता है तो पंडित जी कहते हैं! मेरे पास अभी समय नहीं है! मुझे शाम तक वक्त मिलेगा तो मैं चला आऊंगा! इस पर दुखी थोड़ा जिद करता है! तो पंडित जी उसे कहते हैं ठीक है! तुम घास लाए हो तो गाय को दे दो! और द्वार पर थोड़ा झाड़ू लगा दो,यहां बैठक भी कई दिनों से नहीं लिपि है तो इसे गोबर से लिप देना,फिर जरा आराम करके चलूंगा, हां! यहां लकड़ी भी चीर देना,खलियान में चार खाली भूसा पड़ा है! उसे उठा लाना और उस ओली में रख देना!
इतना सुनने के बाद पंडित जी को खुश रखने के लिए दुखी फौरन हुक्म तामिल करने लगा! द्वार पर झाड़ू लगाई,बैठक को गोबर से लीपा,तब तक 12:00 बज गए थे! पंडित जी पूजन करने चले गए! दुखी ने सुबह से कुछ नहीं खाया था! उसे भी जोर की भूख लगी पर वहां खाने को क्या रखा था! घर यहां से मिल दूर था! वहां खाने जाए तो पंडित जी गुस्सा हो जाए! बेचारे ने भूख दवाई और लकड़ी फाड़ने लगा! लकड़ी पर मोटी-सी गांठ थी! उस लकड़ी पर न जाने कितने भक्तों ने ज़ोर आजमा लिया था!
दुखी घास छिलकर बाजार ले जाने का कार्य करता था! लकड़ी चीरने की आदत उसे नहीं थी! घास की खुरपी के सामने सिर झुका देती थी! यहां कस-कस कर कुल्हाड़ी से बल लगाता पर गांठ पर निशान तक नहीं पड़ता! कुल्हाड़ी उचट जाती थी! पसीने में तर-था! हाप्ता था,थक कर बैठ जाता था! फिर उठता था! हाथ नहीं उठते थे! पैर कांप रहे थे! कमल सीधी ना होती थी! आंखों तले अंधेरा छा जाता,सिर में चक्कर आ रहे थे! ऊपर से शरीर भी कमजोर था! फिर भी अपना कार्य किया जाता था! ताकि पंडित जी खुश रह सके और उसकी बेटी के लिए अच्छा शगुन विचार दें! दुखी सोचने लगा,कि कहीं गुटका तंबाकू चिलम मिल जाती तो भूख मिट जाती शरीर में शायद थोड़ी सी ताकत आ जाती!
उसे याद आता है! कि इसी गांव में एक गौण जाति का रहता है उसके घर तंबाकू चिलम जरूर मिलेगी! वहां से वह तंबाकू चिलम ले आता है! और उसके पास आग नहीं रहती है! इसलिए वह पंडित जी के यहां आग मांगने चला जाता है! पंडित जी भोजन कर रहे थे!
"पंडिताइन ने पूछा", यह कौन आदमी आग मांग रहा है!
"पंडित ने कहा", अरे! ससूरत दुखिया चमार है!,
कहां है! थोड़ी सी लकड़ी चीर दो! आग तो है दे दो,
"पंडिताइन थोड़ा सा भाव में चढ़ाकर कहती हैं", तुम्हें तो जैसे पोथी पत्रे के फेर में धर्म-कर्म किसी बात की सुद ही नहीं रहती! चमार हो,धोबी हो,पासी हो मुंह उठाए घर में चला आए! हिंदू का घर ना हुआ धर्मशाला हुई जैसे! खैर गुस्सा में ही सही पंडिताइन उसे आग दे देती हैं! पर आग चिमटे से ऐसे फेंक कर देती है कि आग दुखी के सर से जाकर टकराती है! और दुखी का सर जल जाता है!
यहां देखकर पंडिताइन को उस पर थोड़ी-सी दया आ जाती है!
"पंडिताइन कहती है", ए चमारवा कुछ खाना-वाना खाया कि नहीं! के भूखे पेट काम कर रहा है क्या!
"पंडित कहता है", ठीक है तो तुम दे दो खाना इसे, इसी तरह पंडित और पंडिताइन आपस में बहस करते हैं! परंतु दुखी को खाना नहीं मिल पाता और दुखी भूसा उठाने के लिए चला जाता है! भूसा उठाने के बाद दुखी आधे घंटे तक लकड़ी चलता है! फिर थक कर वही सो जाता है! 4:00 बज गए थे! पंडित जी खाने के बाद सो गए अब नींद खुली तो देखा दुखी सो रहा था!
घासीराम ने जोर से बोला,अरे! दुखिया तू सो रहा है! लकड़ी तो अभी तक ज्यों की त्यों पड़ी है! इतनी देर तक तू करता क्या रहा था! मुट्ठी भर भूसा उठाने में सांझ कर दी! ऊपर से सो रहा है! उठा ले कुल्हाड़ी और लकड़ी फाड़ डाल तुझसे जरा-सी लकड़ी नहीं फटती! फिर सहित शगुन भी वैसे ही होगा! मुझे दोष मत देना फिर यह सुनकर दुखिया फिर कुल्हाड़ी उठाता है! पंडित घास के पास आकर खड़े हो गए! और बढ़ावा देने लगे,हां! मार और जोर से मार,तेरे हाथ में जैसे दम ही नहीं है! लगा कस के देख फटी जा रही है! मार उसी दरार में मार,दुखी अपने होश में ना था! ना जाने कौन-सी शक्ति उसके हाथों को चला रही थी! वहां थकान,भूख,कमजोरी सब मानो भाग गई! उसे अपने बाहुबल पर स्वयं विश्वास नहीं हो रहा था! एक एक चोटू वज्र की तरह पढ़ते थे! आधे घंटे तक वहां इसी तरह हाथ चलाता रहा! यहां तक की लकड़ी बीच से फट गई! और दुखी के हाथ से कुल्हाड़ी छूट कर गिर पड़ी! इसके साथ वहां भी चक्कर खाकर गिर पड़ा! भूखा,प्यासा,थका हुआ शरीर जवाब देगा!
पंडित जी ने पास जाकर देखा तो उसका शरीर आंकड़ा हुआ था! दुखिया लकड़ी चिरते चिरते मर गया! एक क्षण भर में गांव घर में खबर हो गई! पूरी ब्राह्मणों की बस्ती थी! केवल एक घर गौण का था! लोगों ने इधर का रास्ता छोड़ दिया! कुए का रास्ता उधर से ही था! पानी कैसे भरा जाए! चमार की लाश से होकर पानी भरने को जाए! एक बुढ़िया ने पंडित से कहा आप ये लाश फिकवा क्यों नहीं देते! कोई पानी पियेगा की नही! उधर गौण ने गांव के सभी चमार को कह दिया कि लाश फेंकने कोई नही जायेगा! पुलिस की तहकीकात होगी, वरना सबके सब फसोगे! पंडित गांव में चला गया लेकिन कोई चमार लाश उठाने नही आया!
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लेकिन दुखी की बीवी और बेटी कोलाहल करती आयी! लोग कहने लगे एक ब्राह्मण ने एक गरीब को मार दिया! ब्राह्मण होगा, होगा तो अपने घर का! चमार की बीवी और बेटी भी कोलाहल करके चली गई!
फिर क्या जैसे तैसे रात तो कटी,अब सुबह होने वाली थी! थोड़ा-थोड़ा धुंधला-सा था! ब्राह्मण ने रस्सी उठाई एक फंदा बनाक! दुखी के पर में डाल कर उसे घसीटता हुआ गांव से बाहर ले गया! और गांव के बाहर छोड़ आया! आकर पंडित ने इस्नान किया घर में गंगा जल का छिड़काव किया! और दुर्गा पाठ किया!
उधर चमार की लाश को गीदड़,कुत्ते लोच लाेच कर खा रहे थे!
यह कहानी एक सच्ची घटना नही है परंतु इस कहानी से हमे,गरीब पर हुए अत्याचार से अवगत कराती है!



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