बंदर और मगरमच्च की कहानी in hindi | मूर्ख मगरमच्छ | चालाक बंदर | hindi Motivational Story



बंदर और मगरमच्च की कहानी in hindi | मूर्ख मगरमच्छ | चालाक बंदर | hindi Motivational Story

आज हम एक चालाक बंदर और मूर्ख मगरमच्छ की कहानी पड़ेंगे!

एक बार की बात है! नदी किनारे एक जामून का था! जिसके जामून बहुत मीठे एवं स्वादिष्ट थे! उस पेड़ पर एक बंदर रहता था! ज्योकि रोज़ रोज़ मिठे जामून खाकर अपना पेट भरता था! नदी किनारे लगे पेड़ के जामून खाने मगरमच्छ भी आते थे! उन्हें भी वह के जामून बहुत पसंद थे!


थोड़े दिन बाद बंदर और मगरमच्छ में मित्रता हो गई थी!  मगरमच्छ रोज़ आता और बंदर उसे रोज़ मिठे मिठे जामून खिलाता था! मगरमच्छ बड़े आनंद के साथ उसका सेवन करता था! मगरमच्छ के साथ ही उसकी पत्नी भी रहती थी! जिसके लिए वह अकसर जामून ले जाया करता था! हर रोज़ यही चलता रहता था!


एक दिन मगरमच्छ अपनी पत्नी के लिए अपने घर जामून लेकर गया तो पत्नी कहती हैं! की तुम्हे यह जामून कौन देता है! मगरमच्छ बोला जामून के पेड़ पर मेरा मित्र बंदर रहता है! वही मुझे मिठे मिठे जामून लाकर देता है! पत्नी बोलती है यह जामून तो काफ़ी मिठे एवं स्वादिष्ट है! मगरमच्छ की पत्नी सोचती है! की जामून इतने मिठे है तो बंदर तो इसे रोज़ खाता है उसका कलेजा कितना स्वादिष्ट होगा! फिर वह अपने पति से कहती हैं! मुझे वह बंदर चाहिए! मुझे उसका कलेजा खाना है!


मगरमच्छ बंदर के पास जाता है! और बोलता है! मित्र मेरी पत्नी तुम्हे देखना चाहती है! उसे तुम्हारे दिए गए जामून काफी पसंद है! क्या तुम मेरे साथ मेरे घर चलोगे! बंदर बोलता है! मैं कैसे जाऊंगा! मगरमच्छ बोलता है आओ मित्र मेरी पिट पर बैठ जाओ मैं तुम्हे अपनी पीठ पर बैठाकर ले चलूंगा! फिर क्या बंदर मगरमच्छ की पीठ पर बैठ जाता है! और वे दोनो बाते करते करते नदी में बीच में पहुंच जाते हैं!


बंदर और मगरमच्च की कहानी in hindi | मूर्ख मगरमच्छ | चालाक बंदर | hindi Motivational Story

मगरमच्छ बंदर से बोलता है! मित्र मेरी पत्नी तुम्हरा कलेजा खाना चाहती है! फिर बंदर डर के मारे कांप उठता है और सोचता है कहा फस गया मैं, बंदर अपनी जान बचाने के लिए एक तरकीप सोचता और मूर्ख मगरमच्छ से बोलता है अरे! मित्र तुम्हारी पत्नी को मेरा कलेजा खाना है! लेकिन कलेजा तो में अपने पेड़ पर ही छोड़ आया हूं! चलो फिर से वही चलते हैं! मेरे कलेजा तो वह है आपकी पत्नी उसे खाएंगी कैसे! फिर मगरमच्छ बंदर की चाल समझ नहीं पाता,और बंदर के कहने पर पेड़ की ओर चल देता है! नदी के किनारे आते ही बंदर अपने पेड़ पर छलांग लगा देता है! और मगरमच्छ को बोलता है! है! मूर्ख निकल जा यह से, तुम्हारी पत्नी मुझे खाना चाहती थी! मेरा कलेजा तो मेरे पास ही था! 

फिर क्या मूर्ख मगरमच्छ अपना मुंह लटकाए हुए! अपने घर की और चल देता है! अब से उसे न जामून मिलते और न ही बंदर!


सारांश - यह बात तो वही हुई न, नदी में रहकर मगरमच्छ से बैर!

यानी मगरमच्छ को रोज बड़ी आसानी से मिठे मिठे जामून खाने को मिलते थे! फिर भी उसकी पत्नी को बंदर के कलेजे की पड़ी थी! उसे कलेजा खाना था! अब न कलेजा मिल सका और रोज का भोजन भी बंद!

दोस्तो हम वही का कर देते है जैसे 'जिस थाली में खाते है, उसी थाली में छेद कर देते हैं' फिर थाली तो रहती है लेकिन किसी काम की नही रह जाती!

दोस्तो इस कहानी के माध्यम से आपको क्या सबक मिलती है आप कॉमेंट में अपनी राय जरूर दे!




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